भारत ने उलानबटार में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय की कॉप-17 बैठक के दौरान भूमि बहाली और सूखा-प्रतिरोधक क्षमता के लिए विविध, पर्याप्त और पूर्वानुमानित वित्त की मांग की। PIB विज्ञप्ति के अनुसार भारतीय पक्ष ने कहा कि केवल सरकारी बजट पर्याप्त नहीं होगा और सार्वजनिक तथा निजी पूंजी को लंबे समय तक चलने वाली व्यवस्था में जोड़ना होगा।
सरकारी प्रस्तुति में संप्रभु हरित बांड, क्षतिपूर्ति वनीकरण कोष और ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम को संभावित साधनों के रूप में गिनाया गया। ग्रीन क्रेडिट के वर्णित मॉडल में बहाली के पांच वर्ष बाद और कम से कम 40 प्रतिशत वन आवरण घनत्व होने पर क्रेडिट जारी करने का प्रावधान बताया गया। स्रोत ने यह भी कहा कि ऐसे क्रेडिट का उपयोग निर्धारित दायित्वों के लिए एक बार किया जा सकता है।
वित्त जुटना अपने आप सफल पारिस्थितिकी बहाली का प्रमाण नहीं है। भूमि अधिकार, स्थानीय समुदाय की सहमति, देशी प्रजातियों का चयन, पानी की उपलब्धता, स्वतंत्र निगरानी और परिणामों का सार्वजनिक रिकॉर्ड जरूरी हैं। एक ही भूभाग पर अलग योजनाओं के दावे दोहराए न जाएं और कार्बन या हरित क्रेडिट के लिए पर्यावरणीय लाभ को बढ़ा-चढ़ाकर न दिखाया जाए।
हिमाचल में वन, चरागाह और जलग्रहण क्षेत्रों की बहाली के लिए ग्राम पंचायतों तथा उपयोगकर्ता समूहों को शुरुआती योजना से शामिल करना महत्वपूर्ण होगा। परियोजना का मूल्यांकन खर्च से नहीं, मिट्टी, पानी, जैव विविधता और आजीविका में टिकाऊ सुधार से होना चाहिए। चित्र वास्तविक कॉप-17 बैठक का नहीं, भूमि बहाली योजना का प्रतिनिधि दृश्य है।







